राजा विक्रमादित्य का इतिहास जीवन परिचय | Maharaja Vikramaditya history in hindi

भारत का इतिहास सदैव से ही महापुरुषों की जीवनगाथा का प्रमाण रहा है। भारत के इतिहास, समाज एवं संस्कृति पर देश के महापुरुषों का व्यापक प्रभाव रहा है। दो हजार वर्ष पूर्व हमारे देश में एक ऐसे ही महान राजा, राजा विक्रमादित्य ने राज किया था जिन्होंने अपने बाहुबल से भारतवर्ष की सीमाएं जम्बूद्वीप के बाहर तक विस्तृत कर दी थी। विदेशी शासकों को पराजित करने के अतिरिक्त इन्होने मानव समाज में नैतिक शिक्षाओ के लिए बेताल पच्चीसी एवं सिंहासन बतीसी जैसे अमूल्य ग्रंथो के माध्यम से भी समाज में नैतिक चेतना को जगाने का कार्य किया। आज के इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको राजा विक्रमादित्य का इतिहास जीवन परिचय (Maharaja Vikramaditya history in hindi) सम्बंधित जानकारी प्रदान करने वाले है जिसके माध्यम से आप भारत के महान शासक राजा विक्रमादित्य के जीवनवृत एवं भारतीय संस्कृति में उनके अमूल्य योगदान से परिचित हो सकेंगे।

औरंगजेब जीवन परिचय इतिहास

राजा विक्रमादित्य का इतिहास
महाराजा विक्रमादित्य का इतिहास

राजा विक्रमादित्य का इतिहास, जन्म और जीवन

राजा विक्रमादित्य के जन्म को लेकर इतिहासकार एकमत नहीं है जिसका कारण इस सम्बन्ध में पर्याप्त साक्ष्यों का ना होना है। अधिकतर इतिहासकार मानते है की उनका जन्म 102 ई. पू. के आसपास हुआ था। इनके जन्म को लेकर विभिन किवदंतियाँ प्रचलित है। एक जैन साधु महेसरा सूरी की कथा के अनुसार उज्जैन के एक शासक गर्दभिल्ला या गर्धववेष ने अपने बाहुबल के उपयोग से एक सन्यासिनी का अपहरण किया था जिसके भाई की गुहार पर शकों ने सन्यासिनी को गर्दभिल्ला के चंगुल से मुक्त कराया और गर्दाभिल्ला को जंगल में मरने के लिए छोड़ दिया। गर्दभिल्ला को जंगली जानवरो ने अपना शिकार बना दिया और और उसकी मृत्यु हो गयी। कहा जाता है की राजा विक्रमादित्य इसी अत्याचारी शासक गर्दभिल्ला के पुत्र थे जिन्होंने अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए शकों को पराजित किया था।

कुछ दंतकथाओं में 78 ई. में विक्रमादित्य के शालिवाहन नामक राजा से पराजित होने की बात भी की जाती है परन्तु समय के अंतर के कारण यह संभव प्रतीत नहीं होता है। राजा विक्रमदित्य के गर्दाभिल्ला के पुत्र होने या राजा शालिवाहन से पराजित होने के पुख्ता प्रमाण नहीं है परन्तु राजा विक्रमादित्य के द्वारा शकों को हराना सच्ची घटना है जिसका प्रमाण हमारे देश में शक सम्वत का प्रचलन एवं विक्रमादित्य की उपाधि होना है।

भारत में शक सम्वत का प्रचलन

राजा विक्रमादित्य को कई इतिहासकार विक्रम सेन के नाम से भी जानते है। प्रथम सदी ईस्वी में जब भारत में शकों का राज्य था तो उज्जैन के महाराज विक्रम सेन ने 57-58 ई. पू. में शकों को अपने राज्य की सीमा से बाहर खदेड़ दिया था। शकों के विजय के उपलक्ष में उन्होंने 58 ई. पू. में विक्रम सम्वत का प्रचलन आरम्भ किया था एवं विक्रमादित्य की उपाधि धारण की थी। अपने भ्राता भृतहरि के संन्यास ग्रहण करने के पश्चात विक्रमादित्य ने राज्य की बागडोर संभाली थी एवं न्यायपूर्ण तरीके से शासन किया था। अपने कल्याणकारी कार्यो के लिए राजा विक्रमादित्य जनता के मध्य लोकप्रिय थे एवं अपनी दयालुता एवं न्यायप्रियता के लिए उन्हें चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की उपाधि भी प्रदान की गयी थी। इस प्रकार से विक्रमादित्य नाम ना होकर एक उपाधि थी।

सम्राट विक्रमादित्य की न्यायप्रियता एवं जनहितकारी कार्यो के कारण भारतीय इतिहास में विक्रमादित्य एक लोकप्रिय उपाधि बन गयी एवं राजा विक्रमादित्य के पश्चात भी कई भारतीय राजाओं ने इस उपाधि को धारण किया। इनमे गुप्त वंश के चन्द्रगुप्त द्वितीय एवं 15वीं शताब्दी में भारत के प्रमुख राजा सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य प्रमुख है। इसके अतिरिक्त भी भारतीय इतिहास में कुल 14 राजाओं ने विक्रमादित्य उपाधि को धारण किया है।

राजा विक्रमादित्य की नैतिक शिक्षाएँ

अपने साहस एवं दयालुता के अतिरिक्त अपनी न्यायप्रियता के कारण राजा विक्रमादित्य जनता के बीच अत्यधिक लोकप्रिय थे। कहा जाता है की जो शासक, राजा विक्रमादित्य के समान दयालु एवं न्यायप्रिय हो वही विक्रमादित्य की उपाधि की धारण करने का पात्र होता था। अनेक किवदंतियों के अनुसार राजा विक्रमादित्य अपनी प्रजा का हालचाल जानने के लिए स्वयं छदम वेश में नगर के भ्रमण पर जाते थे एवं प्रजा के सुख-दुखो के बारे में जानकारी प्राप्त करते थे। राजा विक्रमादित्य के नैतिक शिक्षाओं का संकलन बृहत्कथा, बेताल पच्चीसी एवं सिंहासन बतीसी जैसे अमूल्य ग्रंथो से प्रकट होता है। हालांकि ये कथाएँ वर्तमान में अतिश्योक्तिपूर्ण प्रतीत होती है परन्तु इन कथाओ का मर्म समझने पर समझ आता है की ये कथाएँ प्रतीक के रूप में मानव जीवन के महत्वपूर्ण तत्वों जैसे न्याय, दयालुता एवं मानवता का सन्देश देती है।

प्राचीन काल से ही वेद, पुराण, उपनिषद एवं अन्य प्रेरक ग्रथों के माध्यम से हमे मानवीय जीवन के मूल्यों का महत्व समझाया जाता है उसी प्रकार से राजा विक्रमादित्य के नैतिक शिक्षाओं का संकलन बृहत्कथा, बेताल पच्चीसी एवं सिंहासन बतीसी के माध्यम से भी मानव जीवन को नैतिकता एवं न्यायपूर्ण जीने की शिक्षा प्रदान की गयी है।

राजा विक्रमादित्य की गौरव गाथाएं

राजा विक्रमादित्य अपनी न्यायप्रियता एवं दयालुता के लिए प्रजा के बीच सदैव ही प्रसिद्ध रहे है। यहाँ राजा विक्रमादित्य की गौरव गाथाओं की संक्षिप्त जानकारी प्रदान की गयी है :-

बृहत्कथा

बृहत्कथा में राजा विक्रमादित्य से सम्बंधित विभिन प्रकार की गौरवशाली गाथाएँ शामिल है। इसमें सबसे प्रसिद्ध कथा राजा विक्रमादित्य के न्याय को लेकर है। इस कथा के अनुसार स्वर्ग के राजा इंद्र ने एक बार राजा विक्रमादित्य की न्याय की परीक्षा लेने के लिए उन्हें अपने दरबार में आमंत्रित किया। इंद्र ने राजा विक्रमादित्य को अपने दरबार की 2 अप्सराओं रम्भा और उर्वशी के नृत्य में बेहतर नर्तकी का चयन करने को कहा। चूँकि दोनों की अप्सराए एक से बढ़कर एक थी इसलिए दोनों में से किसी एक अप्सरा का चयन करना मुश्किल हो गया था। राजा विक्रमादित्य अपनी न्यायप्रियता के लिए प्रसिद्ध थे अतः उन्हें एक तरकीब सूझी। राजा ने दोनों अप्सराओं के हाथ में एक-एक फूल का गुच्छ दिया और उसके ऊपर बिच्छू रख दिया।

इसके बाद दोनों नर्तकियों को बिना फूल के गुच्छे को हिलाये-डुलाये नृत्य करना था। रम्भा को नृत्य के दौरान बिच्छू ने काट लिया परन्तु उर्वशी ने अपने बेहतर नृत्य एवं संतुलित मुद्राओं के कारण फूल पर बैठे बिच्छू को किसी भी प्रकार की तकलीफ नहीं होने दी जिसके कारण उर्वशी के पूरे नृत्य के दौरान बिच्छू को किसी भी प्रकार की तकलीफ नहीं हुयी और बिच्छू आराम से फूल के गुच्छ पर बैठा रहा। इस प्रकार से राजा विक्रमादित्य की सूझ-बूझ एवं न्यायप्रियता से देवराज इंद्र अत्यंत प्रसन्न हुए और राजा विक्रमादित्य को 32 बोलने वाली मूर्तियाँ प्रदान की जिनके आधार पर सिंहासन बतीसी नीतिकथा का संग्रह हुआ है।

बेताल पच्चीसी 

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भारतवर्ष की सबसे प्रसिद्ध कथाओ में शुमार बेताल पच्चीसी राजा विक्रमादित्य की न्याय-शक्ति का बोध कराने वाली नैतिक कथाये है। इस कथा संग्रह में कुल पच्चीस कहानियाँ है जिसके कारण इसका नाम बेताल पच्चीसी यानी पिचाश की पच्चीस कहानियाँ पड़ा है। एक साधु के आग्रह करने पर राजा विक्रमादित्य को एक पेड़ पर लटके बेताल को उतार कर लाना है परन्तु शर्त यह है की राजा को बेताल से एक भी शब्द नहीं कहना है। राजा बेताल को पेड़ से उतार कर लाता है परन्तु हर बार बेताल राजा को एक नीतिपूर्ण कथा सुनाता है। कथा के अंत में बेताल राजा को एक पहेली देता है और श्राप देता है की यदि उसने उत्तर जानने के बावजूद भी उत्तर नहीं दिया तो उसका सर फट जायेगा। अंत में राजा पहेली का सही उत्तर दे देता है और बेताल उड़ कर पेड़ पर चढ़ जाता है। इस प्रकार से यह नीतिकथा चलती रहती है।

सिंहासन बतीसी

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सिंहासन बतीसी ग्रंथ में कुल 32 कथाएँ है। कहा जाता है की उज्जैन के राजा भोज के राज्य में एक किसान के खेत में एक दिव्य सिंहासन प्रकट हुआ जिसमे 32 पुतलियाँ या मुख थे। जब राजा भोज ने सिंहासन पर बैठने की कोशिश की तो पुतलियों ने राजा भोज से खुद को राजा विक्रमादित्य के समान न्यायप्रिय, दयालु एवं प्रजा हितैषी साबित करने को कहा और एक-एक कर 32 कहानियां सुनाई। राजा ने सभी कहानियों से प्रकट सवालों के सही जवाब दिए एवं सिंहासन पर बैठने में कामयाब हो गया।

इस प्रकार से इस आर्टिकल के माध्यम से आपको राजा विक्रमादित्य एवं उनके जीवन के बारे में सम्पूर्ण जानकारी प्रदान की गयी है।

राजा विक्रमादित्य सम्बंधित अकसर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

राजा विक्रमादित्य कौन थे ?

राजा विक्रमादित्य उज्जैन राज्य के न्यायप्रिय, दयालु एवं प्रजा हितैषी राजा थे।

राजा विक्रमादित्य द्वारा विक्रम सम्वंत का प्रचलन कब शुरू किया गया ?

राजा विक्रमादित्य द्वारा विक्रम सम्वंत का प्रचलन शकों पर विजय के उपलक्ष में 58 ई.पू. में शुरू किया गया।

क्या राजा विक्रमादित्य के दरबार में नवरत्न थे ?

हाँ राजा विक्रमादित्य के दरबार में नौ महान विद्वान निवास करते थे जिन्हे नवरत्न कहा जाता था। परन्तु यह याद रखना आवश्यक है की ये नवरत्न गुप्त वंश के राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय जिन्हे विक्रमादित्य की उपाधि प्रदान की गयी थी के दरबार में निवास करते थे ना की प्रथम राजा, राजा विक्रमादित्य के दरबार में।

राजा विक्रमादित्य की गौरव गाथाएं किन ग्रंथों में संकलित है ?

राजा विक्रमादित्य की गौरव गाथाएं – बृहत्कथा, बेताल पच्चीसी एवं सिंहासन बतीसी नीतिकथा ग्रंथो में संकलित है।

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