वीर सावरकर की जीवनी, माफ़ीनामा, कविता Veer Savarkar jayanti 2023

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अपने कार्यो के कारण इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने वाले महापुरुषों में वीर सावरकर का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। वीर सावरकर स्वतंत्रता के पश्चात भारत की राजनीति में सदैव से ही चर्चा का विषय बने रहे है। भारत में अधिकतर लोग उन्हें देशभक्त, हिंदुत्ववादी और अखंड राष्ट्रप्रेमी के रूप में स्मरण करते है। वही कुछ लोग उन्हें विभिन विवादों के कारण एक विवादस्पद व्यक्ति के रूप में भी मानते है। भारत की राजनीति में वीर सावरकर के नाम को लेकर विभिन समय पर विभिन मुद्दों से सम्बंधित चर्चा होती रहती है ऐसे में हमें वीर सावरकर के जीवन के विभिन पहलुओं से अवगत होना आवश्यक है। आज के इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको वीर सावरकर की जीवनी, माफ़ीनामा, कविता (Veer Savarkar jayanti 2023) के बारे में जानकारी प्रदान करने वाले है।

वीर सावरकर की जीवनी
वीर सावरकर की जीवनी

इस आर्टिकल के माध्यम से आप वीर सावरकर की जीवनी एवं जीवन के विभिन पहलुओं के बारे में जानकारी प्राप्त करने के अतिरिक्त विनायक दामोदर सावरकर का माफ़ीनामा एवं भारतीय राजनीति में इनके प्रभाव के बारे में भी जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।

वीर सावरकर का संक्षिप्त परिचय

यहाँ आपको वीर सावरकर के जीवन के सभी प्रमुख बिन्दुओ की संक्षिप्त जानकारी प्रदान की गयी है :-

पूरा नाम (Full Name)विनायक दामोदर सावरकर
अन्य नाम (Other Name)वीर सावरकर
जन्म (Birth)28 मई 1883
जन्म स्थान (Birth Place)नासिक, मुंबई, भारत
शैक्षिक योग्यता (Educational Qualification)वकालत
पेशा (Profession)वकील, लेखक, राजनीतिज्ञ और सामाजिक कार्यकर्ता
जाति (Caste)हिंदू, ब्राह्मण
राष्ट्रीयता (Nationality)भारतीय
वैवाहिक स्थिति (Marital Status)मैरिड
पत्नी का नाम (Wife’s name)यमुनाबाई
संस्था (Organization)अभिनव भारत समिति 
मृत्यु (Death)26 फरवरी 1966
प्रसिद्धि (Famous for)हिंदुत्व

इस प्रकार से यहाँ आपको वीर सावरकर के जीवन का संक्षिप्त परिचय दिया गया है।

वीर सावरकर की जीवनी

भारत के स्वतंत्रता इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर जिन्हे की प्रायः वीर सावरकर भी कहा जाता है भारत की राजनीति में महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में जाने जाते है। हिंदुत्व के कट्टर समर्थक एवं राष्ट्रवाद की भावना से ओतप्रोत वीर सावरकर का जीवन देश की आजादी के लिए क्रांतिकारी गतिविधियों में व्यतीत हुआ जिसके पश्चात इन्होने हिंदुत्व के उत्थान में अपना सर्वश्व न्योछावर कर दिया। अपने जीवनकाल में अंग्रेजों से अपने रिहाई के लिए माफीनामा लिखने, गांधीजी का कट्टर आलोचक होने एवं हिंदुत्व के सम्बन्ध में अपने विचारो के कारण वीर सावरकर को कई लोग विवादस्पद व्यक्तित्व भी मानते है यही कारण रहा है की देश की राजनीति में सावरकर को लेकर विभिन विचारधाराओं का वर्चस्व देखने को मिलता है।

जहाँ सावरकर के समर्थक उन्हें कट्टर हिंदुत्ववादी नेता एवं राष्ट्रभक्त मानते है वही विरोधी सावरकर के माफीनामा को लेकर उनकी आलोचना करते है। हालांकि सावरकर के जीवन को समझने एवं उनकी विचारधारा को गहराई से जानने के लिए हमे निष्पक्ष होकर उनके जीवन के विभिन पहलुओं को जानना अनिवार्य है तभी हम वीर सावरकर के जीवन का निष्पक्ष मूल्याङ्कन कर सकेंगे।

वीर सावरकर कौन है ?

वीर सावरकर भारत की आजादी की लड़ाई में प्रमुख भूमिका निभाने वाले भारतीय क्रांतिकारी के रूप में जाने जाते है जिन्होंने अपना जीवन देश की आजादी एवं हिंदुत्व के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण वे आजादी की लड़ाई के दौरान एक प्रमुख व्यक्तित्व के रूप में उभरकर सामने आये। वीर सावरकर वकालत का पेशा करने के अतिरिक्त प्रखर लेखक भी थे जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अपने लेखों के माध्यम से क्रांतिकारियों में जोश जगाने के कार्य भी किया। इसके अतिरिक्त आजादी की लड़ाई में क्रांतिकारी गतिविधियों में तेजी लाने के लिए उन्होंने विभिन संगठनो का भी गठन किया था जिसमे वर्ष 1904 में स्थापित की गयी अभिनव भारत संस्था प्रमुख है। इसके अतिरिक्त देश की आजादी के दौरान भी इन्होने राष्ट्रवादी लेखों के माध्यम से जनता में जागरूकता जगाने में प्रमुख भूमिका निभायी थी। हिंदुत्व के सम्बन्ध में इनके लेख वास्तव में प्रशंसनीय है हालांकि कई लेखो के लिए इन्हे विरोधियों की आलोचना भी झेलनी पड़ी है।

वीर सावरकर का प्रारंभिक जीवन

भारत में हिंदुत्व विचारधारा के जनक एवं सूत्रपातकर्ता के रूप में विख्यात वीर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र में नासिक जिले के भोगुर गाँव में हुआ। इनके पिता दामोदर पन्त सावरकर ब्राह्मण समाज से ताल्लुक रखते थे एवं माता राधाबाई गृहणी थी। मात्र नौ वर्ष की आयु में ही वीर सावरकर ने अपनी माता की खो दिया जिसके पश्चात कुछ वर्षों बाद इनके पिता भी चल बसे। माता पिता के देहांत के पश्चात इनके घर की पालन पोषण की जिम्मेदारी इनके बड़े भाई गणेश पर आन पड़ी जिसे उन्होंने बखूबी निभाया।

इनके बड़े भाई गणेश ने विभिन कठिनाईयों का सामना करते हुए भी अपने भाई-बहनों का पालन पोषण किया और उनकी शिक्षा का दायित्व संभाला। यही कारण रहा की विनायक दामोदर सावरकर के बाल-मन पर अपने बड़े भाई के संघर्ष का प्रभाव पड़ा और इन्होने अपने सम्पूर्ण जीवन में अपने भाई की शिक्षाओं का पालन किया। वर्ष 1901 में 18 वर्ष की आयु में इनका विवाह यमुनाबाई से हुआ। इनकी 2 संताने पुत्री प्रभात चिपलूनकर एवं पुत्र विश्वास सावरकर थी। अपने बचपन के दिनों से ही यह मेधावी छात्र के रूप में प्रसिद्ध थे।

विनायक दामोदर सावरकर की प्रारंभिक शिक्षा

बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के छात्र रहे विनायक दामोदर सावरकर ने वर्ष 1901 में नासिक जिले में स्थित शिवाजी हाईस्कूल से अपनी मैट्रिक की शिक्षा पूर्ण की। विद्याध्ययन में अपनी कुशलता का परिचय देते हुए इन्होने देशभक्ति से ओतप्रोत कविताओं एवं विभिन मुद्दों पर लेखन के माध्यम से अपनी लेखन क्षमता का भी परिचय दिया। इसके पश्चात इन्होने पुणे के फ़र्ग्यूसन कॉलेज से अपनी स्नातक की उपाधि प्राप्त की। हालांकि इस उपाधि को ब्रिटिश सरकार के द्वारा विभिन विद्रोहों में भाग लेने के कारण वापस ले लिया गया था। अपनी स्नातक की शिक्षा के दौरान ही इन्हे उच्च शिक्षा के लिए श्यामजी कृष्ण वर्मा छात्रवृति मिली और ये बैरिस्टर की डिग्री प्राप्त करने के लिए लंदन चले गए।

अपने लंदन प्रवास एक दौरान भी ये वहाँ विभिन क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल रहे एवं फ्री इंडिया सोसाइटी नामक संगठन की स्थापना भी की। साथ ही वे विभिन भारतीय छात्रों को भी स्वतंत्रता आंदोलन के लिए प्रेरित करते रहे। अपने लेखों एवं ओजस्वी भाषणों के माध्यम से इन्होने विदेशी धरती पर भी स्वतंत्रता की अलख जगाने का कार्य किया। अपने लंदन प्रवास के दौरान ही इन्होने इण्डियन वॉर ऑफ़ इण्डिपेण्डेंस : 1857 में भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की क्रांति को भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम घोषित किया।

वीर सावरकर की जीवनी

विनायक दामोदर सावरकर से वीर सावरकर बनने की इनकी जीवनगाथा बड़ी रोचक है। कहा जाता है की बचपन में ही इन्होने मात्र 12 वर्ष की उम्र में ही एक उग्र भीड़ का सामना करके अपने मित्रो का बचाव किया था जिसके बाद इन्हे वीर नाम से सम्बोधित किया गया था। स्वातंत्र्यवीर वीर सावरकर की जीवनी लिखने वाले लेखक श्री सदाशिव राजाराम रानाडे ने वर्ष 1924 में इन्हे स्वातंत्र्यवीर के नाम से सम्बोधित किया था। साथ ही अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों एवं विभिन मौको पर नेतृत्व क्षमता के कारण भी इन्हे वीर पुकारा जाता है।

लंदन में क्रांतिकारी गतिविधियाँ

वर्ष 1906 में लंदन में लॉ की पढ़ाई करने गए वीर सावरकर ने वहां भी विभिन गतिविधियों के माध्यम से भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान दिया था। बचपन से ही कांग्रेस के गरम दल के नेताओ से प्रभावित वीर सावरकर बाल-गंगाधर तिलक, विपिन चंद्र पॉल और लाला लाजपत राय के जीवन से प्रभावित थे। इंग्लैंड में ही अपने प्रवास के दौरान विभिन क्रांतिकारियों के संपर्क में आये एवं यहाँ इन्होने विभिन क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेना आरम्भ कर दिया।

अपने लंदन प्रवास के दौरान ही उन्होंने भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से प्रभावित होकर इस क्रांति का गहन अध्ययन किया था और इस विषय पर अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक इण्डियन वॉर ऑफ़ इण्डिपेण्डेंस : 1857 का लेखन किया था। इस पुस्तक में विभिन तथ्यों एवं प्रमाणों के साथ इन्होने 1857 की क्रांति को भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम की संज्ञा दी थी। ब्रिटिश सरकार द्वारा इस पुस्तक के प्रकाशन को प्रतिबंधित करने के भरकस प्रयास किए गए परन्तु सफल ना हो सके।

वीर सावरकर की जीवनी

आपको बता दे की इससे पूर्व कुटिल ब्रिटिश इतिहासकारों के द्वारा भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को सिर्फ सिपाही विद्रोह (Sepoy mutiny) कहकर इसके महत्व को कम करने का प्रयास किया गया था परन्तु सावरकर ने इस विद्रोह को भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सिद्ध करके इस आंदोलन को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में नवीन आयाम प्रदान किया था। 1909 में इंग्लैंड की राजधानी लंदन की बार एट ला (वकालत) की परीक्षा को उत्तीर्ण करने के बावजूद भी इन्हे वकालत की अनुमति प्रदान नहीं की गयी जिसका कारण इनका ब्रिटिश शासन के सामने घुटने नहीं टेकना था।

वीर सावरकर काला पानी की सजा

लंदन में रहते हुए वीर सावरकर विभिन क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेते रहे थे। लंदन में वीर सावरकर के मित्र मदन लाल ढींगरा द्वारा विलियम हट कर्जन वाईली की गोली मारकर हत्या कर दी थी जिसके पश्चात ब्रिटिश सरकार की वीर सावरकर पर विशेष नजर थी। क्रान्तिकारी मदन लाल ढींगरा के समर्थन में वीर सावरकर ने अख़बार में लेख के माध्यम से उन्हें क्रांतिकारी और देशभक्त बताया जिससे की ब्रिटिश सरकार और भी नाराज हो गयी। इसके पश्चात ब्रिटिश सरकार द्वारा नासिक ज़िले के कलेक्टर एम.टी. जैक्सन की हत्या के आरोप में भी वीर सावरकर को भी अभियुक्त बनाया गया था।

ब्रिटिशर्स के द्वारा कहा गया की कलेक्टर एम.टी. जैक्सन की हत्या में प्रयुक्त बंदूक को वीर सावरकर ने लंदन से मुहैया करवाया था। हालांकि कई इतिहासकार इसे अंग्रेजो को साजिश भी मानते है एवं इसे सावरकर की फँसाने की चाल भी कहते है। सावरकर द्वारा क्रांतिकारी गतिविधियों में सहभागिता एवं ब्रिटिश शासन के खिलाफ बगावत के फलस्वरूप इन्हे मुक़दमे के लिए भारत भेजे जाने का बंदोबस्त किया गया परन्तु यह अंग्रेजो को चकमा देकर फ्रांस में भाग निकले। हालांकि जल्द ही इन्हे गिरफ्तार करके भारत भेज दिया गया।

veer savarkar in cellular jail

भारत में इन पर मुकदमा चलाया गया एवं इन्हे क्रमश 24 दिसम्बर 1910 एवं 31 जनवरी 1911 को दो बार 25-25 वर्ष की सजा सुनाई गयी। इसके लिए इन्हे अंडमान निकोबार की कुख्यात पोर्ट ब्लेयर की सेलुलर जेल (काला पानी) भेजा गया। जहाँ इन्हे अपनी कुल 50 वर्ष की सजा को पूरा करना था।

वीर सावरकर माफ़ीनामा

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारत के पूर्वी भाग में स्थित अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह पर स्थिति कुख्यात पोर्ट ब्लेयर की सेलुलर जेल को अंग्रेजो द्वारा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों को कठोरतम सजा देने के लिए बनाया गया था। द्वीप पर स्थिति इस जेल में कैदियों पर विभिन प्रकार के अमानुषिक अत्याचार किए जाते थे जिसमे कैदियों को काल-कोठरी में बंद करना, कोल्हू में कैदियों को जोतना, नारियल से तेल निकलवाना एवं भरपेट भोजन ना देना शामिल था। साथ ही छोटी-छोटी गलतियों पर कैदियों पर कोड़े भी बरसाए जाते थे। इसी कारण से इस कुख्यात जेल को कालापानी की सजा भी कहा जाता था। वीर सावरकर को मुक़दमे की सुनवाई के पश्चात कालापानी जेल में भेज दिया गया था।

कालापानी की सजा के दौरान ही वीर सावरकर यह समझ चुके थे की कालापानी में रहने से उनका पूरा जीवन कैदियों की भांति ही खत्म हो जायेगा एवं वे देश के स्वतंत्रता संग्राम में किसी भी प्रकार की सक्रिय भूमिका नहीं निभा सकेंगे। यही कारण रहा की देश के स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से भाग लेने एवं अपना योगदान देने के लिए उन्होंने ब्रिटिश सरकार से माफ़ीनामा माँगना ही बेहतर समझा। इसके लिए इन्होने ब्रिटिश सरकार से कुल 6 बार माफीनामे की अर्जी दी जिसकी वकालत बाल गंगाधर तिलक एवं सरदार वल्लभ भाई पटेल ने की। वर्ष 1924 में ब्रिटिश सरकार ने सावरकर के माफीनामे को स्वीकार करके इन्हे रिहा कर दिया। सावरकर के माफीनामे को लेकर उनके विरोधी उन पर निशाना साधते रहते है परन्तु समर्थक वीर सावरकर द्वारा मातृभूमि की सेवा के लिए माफीनामे माँगने को उचित ठहराते है।

हिंदुत्व का दौर

वर्ष 1924 में अंग्रेजो की कैद से रिहा होने के पश्चात वीर सावरकर ने हिंदुत्व की विचारधारा को प्रसारित करना शुरू कर दिया था। इस दौरान वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार संपर्क में भी आये। अपने इन वर्षो के दौरान विनायक दामोदर सावरकर ने हिंदुत्व को बढ़ावा देने के लिए विभिन कार्यो को अंजाम दिया जिनमे विभिन हिंदुत्ववादी आंदोलनों को समर्थन एवं विभिन हिंदुत्ववादी संगठनो को समर्थन देना शामिल था। इसी उद्देश्य के लिए इन्होने रत्नागिरी हिंदू सभा का गठन भी किया था। वर्ष 1937 में इन्हे अपने हिंदुत्ववादी विचारो के कारण हिंदू सभा का अध्यक्ष बना दिया गया था।

इन वर्षो के दौरान विभिन मुद्दों को लेकर इन्होने अपनी बात को प्रमुखता से रखा था एवं मोहम्मद अली जिन्ना के भारत के विभाजन के प्रस्ताव का भी पुरजोर विरोध किया था। साथ ही देश में हिंदुत्व आंदोलन को बढ़ावा देने के लिए इस दौरान वीर सावरकर ने अपने जोशीले भाषणों एवं धारदार लेखों के माध्यम से जनता तक अपने विचारो को भी पहुँचाया था।

वीर सावरकर की लेखनी

बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के छात्र रहे वीर सावरकर ने स्कूल के दिनों से ही लेखनी को थाम लिया था। अपनी लेखनी का प्रयोग उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम आंदोलनों एवं हिंदुत्व के समर्थन में खूब किया था। कॉलेज के दिनों में भी इन्होने विभिन राष्ट्रवादी कविताओं एवं लेखन के माध्यम से युवा क्रांतिकारियों के मध्य जोश जगाने के कार्य किया था। साथ ही वे देश की स्वतंत्रता के समर्थन में भी विभिन पत्रिकाओं में लेख लिखते रहे। हिंदुत्व को बढ़ावा देने के लिए इन्होने विभिन पुस्तकों की भी रचना की थी जिनमे कुछ प्रमुख पुस्तकें इस प्रकार से है :-

  • द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस – 1857
  • हिंदुत्व – हू इज हिंदू?
  • काला पानी
  • हिन्दू राष्ट्र दर्शन
  • द ट्रांसपोर्टेशन ऑफ माई लाइफ
  • हिन्दू पद-पादशाही
  • हिन्दू राष्ट्र दर्शन

इनके अतिरिक्त अन्य सैकड़ो लेखो के माध्यम से भी वीर सावरकर ने भारत के स्वतंत्रता में अपना योगदान देने के महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी।

गाँधीजी से सदैव रहा था विवाद

हिंदुत्व के कट्टर समर्थक एवं देश के प्रमुख क्रांतिकारियों में शुमार देशभक्त वीर सावरकर राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के कटु आलोचक थे। गांधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन में खिलाफत आंदोलन को शामिल करने का इन्होने पुरजोर विरोध किया था और इस आंदोलन को किसी भी प्रकार का समर्थन देने के इंकार कर दिया था। साथ ही गांधीजी द्वारा समय-समय पर चलाये गए विभिन महत्वपूर्ण आंदोलनों का भी इन्होने कड़ा विरोध किया था। गाँधीजी को इन्होने अपने अनेक लेखों में पाखंडी एवं अपरिपक्व नेता भी कहा था। भारत के विभाजन का वीर सावरकर द्वारा पुरजोर विरोध किया गया था एवं गाँधीजी के विचारो एवं कार्यो को ये अपने लेखों के माध्यम से क्रिटिसाइज करते रहते थे। हालांकि गाँधीजी वीर सावरकर को एक योग्य एवं कुशल नेता मानते थे एवं विभिन मौकों पर गांधीजी द्वारा वीर सावरकर की प्रशंसा भी की गयी थी।

savarkar about gandhiji

वर्ष 1948 में गाँधीजी की हत्या होने के पश्चात इन्हे भी गाँधीजी की हत्या में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था परन्तु बाद में इनके विरुद्ध कोई भी अपराध सिद्ध ना होने के कारण सरकार द्वारा वीर सावरकर से माफ़ी मांगी गयी थी। 26 फरवरी 1966 को भारत माँ का यह सपूत चिरनिद्रा में विलीन हो गया जिसके पश्चात इनके जन्मदिवस 28 मई को वीर सावरकर जयंती मनाई जाती है।

वीर सावरकर से जुड़े विवाद

अपने राष्ट्रप्रेम एवं देशभक्ति के कारण सदैव ही वीर सावरकर को सम्मान दिया जाता रहा है। हालांकि मुस्लिमो एवं ईसाइयों के प्रति अपने विचारो के कारण विभिन आलोचक उन्हें सम्प्रदायवादी भी मानते है। अपने विभिन लेखों में वीर सावरकर ने हिन्दुतान को हिन्दुओं, सिखों, जैन एवं बौद्धों की पुण्यभूमि के रूप में मान्यता दी है जबकि हिन्दुतान को मुस्लिमो एवं ईसाइयों की पुण्यभूमि के मुद्दे पर इनका कहना था की भारत मुस्लिमो एवं ईसाइयों की पुण्यभूमि नहीं है। इसके अतिरिक्त अपने लेखों में भी इन्होने हिंदुत्व को बढ़ावा दिया है जिसके कारण भी ये विरोधियों के निशाने पर रहे है। हालांकि वीर सावरकर की जीवनी को देखने के लिए हमे उनके जीवन के विभिन पहलुओं का संतुलित विश्लेषण करना आवश्यक है तभी हम वास्तव में वीर सावरकर की जीवनी के साथ न्याय कर सकते है।

वीर सावरकर की जीवनी सम्बंधित प्रश्न-उत्तर (FAQ)

वीर सावरकर कौन थे ?

वीर सावरकर भारत की आजादी की लड़ाई में प्रमुख भूमिका निभाने वाले भारतीय क्रांतिकारी के रूप में जाने जाते है जिन्होंने अपना जीवन देश की आजादी एवं हिंदुत्व के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। पेशे से बैरिस्टर वीर सावरकर अपनी प्रखर लेखनी के लिए भी जाने जाते है।

वीर सावरकर का जन्म कब हुआ ?

वीर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र में नासिक जिले के भोगुर गाँव में हुआ। ये ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते थे।

वीर सावरकर का पूरा नाम क्या था ?

वीर सावरकर का पूरा नाम विनायक दामोदर सावरकर था।

वीर सावरकर द्वारा लिखित प्रमुख पुस्तक कौन सी है ?

वीर सावरकर द्वारा लिखित प्रमुख पुस्तक इण्डियन वॉर ऑफ़ इण्डिपेण्डेंस : 1857 है जिसके माध्यम से इन्होने 1857 की क्रांति को भारत की स्वतंत्रता की प्रथम क्रांति कहा था।

भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की क्रांति को सर्वप्रथम किसने भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की संज्ञा दी थी ?

भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की क्रांति को सर्वप्रथम वीर सावरकर ने अपनी पुस्तक इण्डियन वॉर ऑफ़ इण्डिपेण्डेंस : 1857 में भारत की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की संज्ञा दी थी।

वीर सावरकर को काला पानी की सजा कब हुयी थी ?

वीर सावरकर को वर्ष 1910 में काला पानी की सजा हुयी थी। वर्ष 1924 में ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया था।

वीर सावरकर की जयंती कब मनाई जाती है ?

वीर सावरकर की जयंती इनके जन्मदिवस 28 मई को मनाई जाती है।

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